वर्णाश्रम आपकी सहयोगिनी तय करेगी

स्वामी निश्चलानंद सरस्वती गोवर्धन मठ पुरी ने एक बार बताया था की ब्राह्मण को 4 वर्ण मे चुनाव का अधिकार है.
क्षत्रिय को सन्यास छोडके 3 वर्णमे चुनाव का अधिकार है.
वैश्य को सन्यास तथा वानप्रस्थ का अधिकार नाही हे.
शूद्र को ही गृहस्थश्रम चलाने का अधिकार तथा जिम्मेदारी है.
अब ये 2 तरीके से आगे बढा सकते है.

अगर आप शंकराचार्य जी के भांति माता से अनुमति लेकर गृहस्थाश्रम प्रवेश से पूर्व ही संन्यास को स्वीकार का लेते हैं तो आपको अन्य 3 भी आश्रमों से मुक्ति मिल जाएगी। पर अनुमति माता से लेनी होती है जो कि सहज नहीं होती. शंकराचार्य भी मगरमच्छ से बच निकले तब अपने जीवन का उद्देश्य माता को समझा सके कि मुझे भी पूरी दुनिया को किसी मकड़जाल से बाहर निकलना होगा।
अगर आप बुद्ध के भांति गृहस्थाश्रम में मृत्यु को देखकर दुख को देखकर यही परम सत्य है और स्वयं प्रकाशित बननेकी अष्टांग मार्ग की बुनियाद को समझते है तो आपके लिए वानप्रस्थाश्रम खुले होंगे।
अगर आप तुकाराम महाराज,  मुंशी प्रेमचंद, या कोई भी दानी सेठ को देखोगे तो उन्होंने गृहस्थाश्रम में ही परमार्थ को पा लिया है.
और अनेकों भक्ति संप्रदाय में संत मिलेंगे जो अपने कर्म से जाने जाते है सावता माली कहते है कभी मंदिर नहीं गए उन्होंने कहा कांदा मूला भाजी यही मेरा काम और यही मेरा भगवान है।

अब 21 वी शताब्दी में बात करें तो हर नारी अपने पति में ये तीन चीजें जरूर देखती है या ऐसा कहे एक घर रोटी बेटी व्यवहार में देखता है ।
की लड़का किसी भी तरह से जमीन के या पैसे के विवाद या किसी भी प्रकार के सामाजिक तनाव के विवाद जैसे संगठित गुन्हेगारी, किसी के साथ दुश्मनी  इससे मुक्त हो तो आज कल विवाह के योग्य लड़का हो सकता हैं।
 (ये हम कह सकते है कि ब्राह्मण के लक्षण है , अगर क्षत्रिय रहेगा तो राजा होने के नाते जमीन की लड़ाई होगी , सेठ व्यापारी होगा तो पैसों की स्पर्धा होगी , और ज्यादातर लोग अपने जमाता या पति को नहीं चाहेंगे कि वो शारीरिक कष्ट से धनार्जन करें।)

जो ऊपर दिए गए विवादों में फंसे लोग अक्सर गृहस्थाश्रम को कठिन समय बना देते है।

और जो विवाद से मुक्त हो वो ज्यादातर समय अपने आप को अकेला महसूस करता है क्योंकि मनुष्य तो समाजशील प्राणी है और उसे संगठन पसंद है लेकिन ये चीजें अधिकार और कर्तव्य को जन्म देते हैं।
और कर्तव्य के बोझ से वो कभी नहीं बच सकता ।

और वो विवाद से बचने के लिए अपने आप को हमेशा घटना के साथ / समय के साथ/ परिस्थिति के साथ बदलन चाहेगा ।

अगर हम प्राकृतिक रूप से बनी व्यवस्था देके तो nature itself is wild in nature वो तो हम है जो एक व्यवस्था बना के रह गए है वरना प्राणियों में और हम में फरक सिर्फ इतना है कि हम घास या मास कच्चा नहीं खाते हमने हर चीज को विधि से युक्त करके अपने लायक बनाके खाते है या जीते है ।
तो यह तो तय है कि आप के अधिकार और कर्तव्य अपने परिवार तक ही होते है और आपके हर व्यवहार में आपकी सहयोगिनी का प्रभाव रहता है।


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