आपका वैचारिक मानबिंदू कोण है! हॉलिवुड, बॉलिवुड...

आज मैने हॉलिवूड मुव्हीज का पॅटर्न समझने की कोशिश की और मुझे बाते समझ में आई की , मैने सबसे पहले मूवी जो इंग्लिश में देखी वो थी अंग द लास्ट एयर बेंडर जो देव पटेल और टीम से बनी थी । 
उसके बाद अनेक डब्ड मूवीज मैने देखी जो सारासार विचार करे तो एक पैटर्न फ़ॉलो करती है ।
उनको ब्रम्हांड के बारे में जानने की बहुत इच्छा है , और मनुष्य की मर्यादा को जानने की बहुत इच्छा है ।
इनसेप्शन, शटर आइलैंड, मैट्रिक्स ,अवतार, कोर, में इन ब्लैक और एमसीयू (मार्वल) , डीसीयू (डिज्नी) , जो आए दिन हमारे पृथ्वी के बाहर या तो भौतिक रूप से या मानसिक रूप से हमे पोहोचने को प्रोत्साहित करते है ।

इसके विपरित बॉलीवुड एक अलग पैटर्न फॉलो करता है यहां हवाईजादा और भगत सिंह जैसी कहानियां भी लड़का और लड़की के संबंध को दिखाए बिना पूरी नहीं होती हालाकि अगर ऐसी मूवी हॉलीवुड में बनती तो वो डॉक्यूमेंट्स पे ज्यादा ध्यान देते बेवजह ये रिलेशनशिप घुसा के व्यवहार को भावनाओ से जोड़ना कोई बॉलीवुड से सीखे।
साउथ मूवीज जो है वहा दो गुट है एक ये बॉलीवुड का पैटर्न कुछ बदलाव के साथ फॉलो करता है जैसे आरआरआर, और बाहुबली जो इतिहास पे  ज्यादा ध्यान से देखने की कोशिश करते है।
इसके बाद अगर में कहु की बॉलीवुड कुछ हद तक सभी जगह से ज्ञान बटोर कर बाट रही है ( ये वाक्य "चोरी"के लिए सौम्य स्वभाव से लिखा गया है) 
तो उनको वो मूवीज क्यों नही मिली जो ऊपर लिखी गई है क्यों वो टॉम क्रूज की मूवी का भी रीमेक बनाते है तो ये प्रेम को बहुत ज्यादा महत्व देते है। और कॉमेडी मैं जो सच में फर्क हमारी संस्कृति और पश्चिम में है वो क्यों जैसे का तैसा लिया जाता है ।

ठीक है तो विचार को बाते करे तो एप्पल के सीईओ रहे स्टीव जॉब्स की पिक्सर कंपनी ने एक पिक्सर थिअरी भी बनाई है जहा वो कोको नामक मूवी में जन्म मरण और हमारी अपने पितरों को प्रति कर्तव्य को बताती है ।
अवतार जैसी मूवी हिंदू संस्कृति के आसपास के विचारो बनी है जो कहता है की हम सब जो बने है मूल एक है और हम जुड़े हुए है।
एमसीयू ने जो बहुत सारे विचार बुने और प्रदर्शित किए है (विंटर सोल्डर वाली सीरीज छोड़ के) और 🐜 मैन जैसी मूवी जो खुद क्वांटम भौतिकी के बारेमे बताती है,  डॉ स्ट्रेंज, वांडा, और ग्रीक और नॉर्डिक भगवान जो उनके साथ रहते है ये सब कॉमिक के टाइम से स्टेन ली ने कैसे बनाई होगी और अपने कर्मकाल में उन्होंने ऐसे कुछ गिनेचुने सिद्ध व्यक्तियो से भी मिलकर वो जग के सामने रखे । तो उन्होंने कल्पना को बस सामन्य परिस्थिति की मर्यादा से थोड़ी ऊपर की सोच ये प्रयोग से बताया ।


तो जैसे लुई पाश्चर और मदर टेरेसा के बारे में एक वाक्य मेने पढ़ा था की भलेही लुई पाश्चर खुद एक पुजारी के घराने से थे , हजारों प्रयोग करने वाले विज्ञानवादी को काहे संत पदवी मिलेगी और मदर टेरेसा के चमत्कारों के वजह से संत की उपाधि मिली ।

पर पूरी दुनिया पाश्चर  जानती है और रहेगी के क्योंकि उन्होंने उस परंपरा से जुड़ना चाहा जो कहती है भाग्य भी उसका साथ देता है जो कर्म करने में तैयार हो , और विज्ञान का कोई एक देश नहीं होता पूरा ज्ञान ही दुनिया को जाने बिना अधूरा है ।और इसीलिए बहुत सारी खोज में निकल कर ये आया की विज्ञान और तकनीक किसी पुरानी सभ्यता के वो अवशेष से बन रहे है जो सनातन चलती आ रही है ।

पर कर्मठ लोगो को ये सवाविज्ञान और तकनीक ल पूछने वाले , दिमाग लगाने वाले पसंद नहीं होते , और जो ब्लाइंड फॉलवर और कन्वर्जन में मदत करे वो सबसे भले होते है (कर्मठो के लिए)। सूफी रुमी, 

मै अगर पूछूं के जब आक्रमण होजैसे  रहा था तब ये शंकराचार्य कहा थे । शिवराज्याभिषेक , अंग्रेज आक्रमण , उस वक्त ये कहा थे। तो मेरी शंका का निरासन वही करेंगे जो इतिहास और भूगोल के बारेमे ठीक से जानते हो ।

तो जैसे बहुत सारे विचार इस जगत में है तो ये बॉलिवुड कौनसे विचार फॉलो करता है ।
सुफी, रुमी, इश्क , इबादत, अली, इमान , ये बेसिक रुल है बॉलिवूड के ।
यहां जबसे सलीम जावेद ने फिल्मे लिखी हैं तबसे प्राण, दिलीप , मनोज इन्होंने जो कार्य किया वो लोप होता नजर आया ।
ऐसा मानते है की वहाबी, और दाऊद के पैसों के चलते ये हो सकता है पर विश्वास करो , फिल्मों के वजह से जान गवाने वाले इसी भूमि पर ज्यादा होंगे और जो जान गंवा दे उसे यूज करना भी आज कल लोग सिख गए है ।
हा लेकिन इश्क छोड़के कुछ बाकी मिला तो वो है हीरोइज्म जो कुछ हद तक धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों से खिलवाड़ करता रहता है ।

वैसे हीरोइजम उधर हॉलीवुड में भी है लेकिन विशेष फरक यही है की यहा हीरो या तो लोगो में भगवान का रूप लेता है या मारा गया हीरो भगवान हो जाता है  वहा हॉलीवुड में हीरो अकेला पूरी दुनिया तबाह करने या होने के बाद भी जिंदा हो तो उसे अपने लोग ढूंढने पड़ते है । वो समाज में ज्यादा घूमने में विश्वास नहीं करते ।


फॉलोअर और बिलिवर में फरक ही यही है की बिलीवर पूर्ण विचार करके ही बिलीव करेगा और वो आवर्त होगा मतलब अगर नया सिद्धांत अगर आपके सामने रख दिया जाए तो आप को व्यवहार की बारीकियां और उसमे ये सिद्धांत ठीक रूप से बैठता है या नहीं ये बिलावर देखेगा फॉलोअर बस सिद्धांत को रटते और पालन करते रहेगा बिना पूरी जानकारी के ।


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